होली की मस्ती पहली जैसी नहीं रही। मुझे याद है लगभग दस वर्ष पहले होली मानाने में जो आनंद और उत्साह होता था वह अब नहीं रहा। एक तो महंगाई और दूसरा दंगा फसाद के भय। इन्ही सब कारणों से होली के रंग फींके लगने लगे हैं। पता नहीं अब फिर से वह होली लौटकर आएगी या नहीं। होली के मज़ा रंग का होता है। लोग अपने परिचितों को रंग लागतें हैं लेकिन जब परिचित ही रंग लवने पर बुरा मानें या मन करें तो होली खेलने में आनंद ही कहाँ रह गया? जिसे रंग लगाओ वोही चिढ जाता है या फिर इस प्रेम के पर्व में बैर मान के बैठ जाता है। फिर क्या लाभ होली खेलने का। आज के युग में तो कंप्यूटर और इन्टरनेट पर ही होली खेल ली जाए यही अच्छा है। सभी मित्रों को होली की शुभकामनायें।
Saturday, February 27, 2010
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