होली की मस्ती पहली जैसी नहीं रही। मुझे याद है लगभग दस वर्ष पहले होली मानाने में जो आनंद और उत्साह होता था वह अब नहीं रहा। एक तो महंगाई और दूसरा दंगा फसाद के भय। इन्ही सब कारणों से होली के रंग फींके लगने लगे हैं। पता नहीं अब फिर से वह होली लौटकर आएगी या नहीं। होली के मज़ा रंग का होता है। लोग अपने परिचितों को रंग लागतें हैं लेकिन जब परिचित ही रंग लवने पर बुरा मानें या मन करें तो होली खेलने में आनंद ही कहाँ रह गया? जिसे रंग लगाओ वोही चिढ जाता है या फिर इस प्रेम के पर्व में बैर मान के बैठ जाता है। फिर क्या लाभ होली खेलने का। आज के युग में तो कंप्यूटर और इन्टरनेट पर ही होली खेल ली जाए यही अच्छा है। सभी मित्रों को होली की शुभकामनायें।
Saturday, February 27, 2010
Friday, February 26, 2010
कई बार अनुभव किया है की बहुत कुछ करने के बाद भी ek उद्वेलन मन के किसी कोने में निरंतर बना रहता है। कोई कविता लिखता हूँ या फिर कोई कहानी, कि शायद इस पीढ़ा का कोई तो उपचार मिले। लिखने के बाद कुछ सीमा तक शांति भी मिलती है लेकिन स्थाई रूप से नहीं। क्योंकि मेरी रचना लोगो तक कैसे पहुचे. इसलिए एक स्वयम की पत्रिका 'साहित्यायन' आरम्भ की। अपनी उसी पीढ़ा को अभिव्यक्त करने के लिए अब यह मार्ग चुना है, जिसे मैंने नाम दिया है, "अभिव्यक्ति मन की।" आशा है मन की बात अब बहुत दूर तक पंहुचा पाऊंगा. मन की बात कहने का एक अच्छा माध्यम मिल गया है।
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