Sunday, October 4, 2015


फेसबुक संस्मरण माला....4
मित्रों, उस विद्यालय के प्राचार्य के बारे में बताता हूँ। वहाँ के प्राचार्य ने मेरा साक्षात्कार लिया और मेरी शैक्षिक व शिक्षणेतर योग्यताओं से प्रभावित होकर मुझे नियुक्त कर लिया। मैं भी पूरे मनोयोग से अपनी नौकरी करने लगा। प्रातःकाल मंदिर में पूजा-वंदना करता तदुपरान्त विद्यालय में अध्यापन कार्य। वहाँ मेरा मन लग रहा था क्योंकि शिव मेरे  आराध्य हैं और शिवाराधना मुझे प्रिय है। इस प्रकार मैं सदाशिव के चरणों में था और अपना प्रिय कार्य अध्यापन भी कर रहा था।
कुछ समय व्यतीत होने के साथ-साथ मैं विद्यार्थियों का प्रिय आचार्य बन गया। विद्यार्थी खाली समय में मेरे पास आ बैठते और मुझसे ज्योतिष, संगीत एवं नैतिक ज्ञान ग्रहण करते। कुछ छात्र अपनी व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान भी मेरे पास आकर खोजते। मुझे तनिक भी भान नहीं था कि छात्रों का मेरे प्रति इतना लगाव स्वयं मेरे लिए कष्टसाध्य हो जाएगा। इसका पता तब लगा जब प्राचार्य ने मेरी योग्यताओं को दरकिनार करके मुझमें बुराइयाँ ढूँढ़ना आरंभ कर दिया। उन्हें मुझसे न जाने किस बात की चिढ़ थी। वह मेरे अच्छे-अच्छे (सिल्क के) कुर्ते, धोतियों, चूड़ीदार पायजामे आदि से युक्त वेशभूषा से चिढ़ने लगे। एक बार प्रबंधक महोदय के आदेशानुसार मैंने प्रत्येक शनिवार सुन्दरकाण्ड का पाठ एवं उस पर प्रवचन आरंभ किया। कुछ शनिवार यह चला भी लेकिन बीच में प्राचार्य महोदय ने स्वयं श्रीमद्भागवतपुराण पर प्रवचन करने का संकल्प लेकर अपना अनुष्ठान आरंभ कर दिया और मेरी कथा बीच में ही छूट गयी। मैं स्कूटर से विद्यालय जाता और वे स्वयं साइकिल से आते थे। संभवतः इसी चिढ़न के कारण उन्होंने मुझसे प्रतिस्पर्धा करनी शुरू कर दी। मेरी ही भाँति पीएच.डी. करने के लिए यहाँ-वहाँ विश्वविद्यालयों में आवेदन आरंभ कर दिये। मेरा मोबाइल फोन देखकर 4 दिनों के अन्दर अपने लिए भी एक मोबाइल फोन ले लिया। वस्तुतः उनके अन्दर हीन भावना थी जिसके कारण वह मेरी बराबरी करना चाहते थे। लेकिन उनके लिए यह अच्छा हुआ क्योंकि उन्होंने पीएच. डी. की और उत्तराँचल में अध्यापक के लिए नियुक्त हो गये। वर्तमान में वह राजकीय इंटर कालेज, पिथौरागढ़ में सरकारी नौकरी कर रहे हैं। मज़ेदार बात यह है कि जब उन्हें पता चला कि मैं लेखक बनना चाहता हूँ और काव्य रचना आदि करता हूँ तो उन्होंने भी काव्य रचना आरंभ कर दी और मेरे उपनाम पवन की भाँति उसने अपना उपनाम प्रती…’ रख लिया। पूरा नाम नहीं बताऊँगा क्योंकि फेसबुक पर नाम सार्वजनिक न करने  का संकल्प लिया है। हाँ, मेरी पुस्तक में सबके असली नाम ही मिलेंगे।
खैर, जो हुआ अच्छा हुआ। कम से कम उन प्राचार्य महोदय का जीवन सँवर गया और वे एक सम्मानित पद पर आसीन हुए। ईश्वर उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करे।
आज के लिए इतना ही अगले रविवार मैं आपको बताऊँगा कि किस प्रकार मैं संस्कृत विद्यालय से सी.बी.एस.ई. विद्यालय में नियुक्त हुआ और कैसे मेरी नौकरी आगे बढ़ती गयी। साथ ही अब मैं अपने प्रेम-संबंधों के विषय में बताना भी आरंभ करूँगा जिसके लिए मेरे कई प्रशंसक प्रतीक्षा कर रहे हैं और मुझे फोन से निरन्तर सम्पर्क कर रहे हैं।

Saturday, September 26, 2015

मित्रों, मैं अपने कुछ संस्मरण फेसबुक के माध्यम से लोगों तक पहुँचा रहा हूँ। साथ ही मैं अब इस ब्लाग पर भी अपने उन्हीं संस्मरणों को लिखूँगा।
मित्रों, वह विद्यालय एक मंदिर द्वारा संचालित था। वह एक आवासीय विद्यालय था जिसमें लगभग 20 (अब पूर्ण संख्या याद नहीं रही) बच्चों ने अलग-अलग कक्षाओं में प्रवेश लिया था। रामगंगा स्थित एक संस्कृत विद्यालय से उस विद्यालय को मान्यता दिलाई गयी थी और कुल चार शिक्षक और एक प्राचार्य की नियुक्ति की गयी थी। मैं उसमें हिन्दी एवं ज्योतिष पढ़ाने के लिए 6 अगस्त 2002 को नियुक्त हुआ था। विद्यालय पूर्ण भारतीय संस्कृति के अनुरूप चलाने की योजना थी। प्रातः काल विभिन्न वैदिक मंत्रों एवं प्रार्थनाओं के साथ विद्यालय आरंभ होता। फिर कुछ समय बाद प्रबंधक महोदय का आगमन होता और मंदिर में रुद्राभिषेक का आयोजन होता। सारी पढ़ाई रोककर सभी को रुद्राभिषेक में जाना अनिवार्य होता। प्रायः सभी छात्र ब्राह्मण थे तो उनको वहाँ वैदिक मंत्रोच्चार, रुद्राष्टायध्यायी इत्यादि का पाठ रुद्राभिषेक के समय प्रतिदिन करना पड़ता था।  न जाने पर प्रबंधक के कोप का भाजन बनना पड़ता। मतलब जबरदस्ती हम भक्ति करवाएँगे। सामंती शासन का अतिलघु रूप वहाँ देखा जा सकता था। प्रबंधक महोदय आरंभ में तो बहुत मान सम्मान से उन बटुकों का चरणस्पर्श करते लेकिन बाद में स्थिति यह हो गयी थी कि माँ-बाप को छोड़े हुए, ममता और वात्सल्य को तरसते उन बटुकों को प्रबंधक महोदय की माँ-बहन की गालियाँ और जूते और लातों की मार तक सहनी पड़ी। वे रोते हुए मेरे पास आते और अपने दुःख मुझे बताते। मुझे यह जानकर दुख होता पर क्या कर सकता था, सिवाय इसके कि मैं उस परिवेश को छोड़कर अन्यत्र चला जाऊं। लेकिन मेरे चले जाने के बाद भी वहाँ यह सब तब तक चलता रहा जब तक वह विद्यालय बन्द नहीं हो गय़ा और भी बहुत सारी बाते हैं लेकिन वे सब विस्तार से पुस्तक में पढ़िएगा। यहाँ केवल झलकियाँ या मुख्यांश ही हैं।

मित्रों, उसी संस्कृत विद्यालय से जुड़ी एक घटना बता रहा हूँ। बड़ी विचित्र बात है कि शिवालय जैसा पवित्र स्थान का वातावरण अत्यन्त दूषित था। हर ओर घरों से निकला गंदा पानी जिसमें करोड़ों की संख्या में मच्छरों के परिवार पनप रहे थे। शिवालय में भगवान पर चढ़ाये जाने वाले फूल पत्ते आदि एक कोने में पड़े-पड़े सड़ते-गलते रहते जिसके कारण अत्यन्त दुर्गंध वातावरण में फैली रहती। वहाँ का पानी इतना प्रदूषित था कि उस पानी में अजीब सी दुर्गंध आती और उस पानी से भीगने वाले पत्थर दो दिनों में ही लाल-भूरे और काले हो जाते।
ऐसे वातावरण में रहने के कारण बच्चों का स्वास्थ्य अक्सर बिगड़ने लगा। कभी पेट खराब, कभी बुखार, कभी कोई अन्य बीमारी। ऐसी इस स्थिति को देखकर एक डॉक्टर की व्यवस्था की गयी जो अक्सर विद्यालय आकर उन बच्चों के स्वास्थ की जाँच करता। उसने कुछ सामान्य दवाइयाँ भी एक अलमारी में रख दीं कि समय-असमय आवश्यकता पड़े तो उन्हें लिया जा सके।
एकबार एक छात्र विनीत पाठक का पेट बुरी तरह बिगड़ गया। इस कारण वह प्रातःकाल होने वाले रुद्राभिषेक में भी नहीं जा सकता और अपनी उदरपीड़ा से व्याकुल रहा। रुद्राभिषेक में न पहुँच पाने पर प्रबंधक महोदय उससे बहुत  रुष्ट हुए और अपना चिरपरिचित वक्तव्य दिया— “भोले नाथ की सेवा नहीं करेगा तो कुछ तो भोगना ही पड़ेगा।“ मुझे समझ नहीं आता कि हम सब ईश्वर की संतान हैं, वह परमपिता है, तो फिर पितास्वरूप ईश्वर हमें कष्ट कैसे दे सकता है? कोई भी पिता अपनी संतान के कष्टों का हरण करता है न कि उसे कष्ट दे। फिर भी प्रबंधक महोदय को अपनी ईश्वर भक्ति के दंभ में पत्थरों में ही ईश्वर दिखता और जीते जागते इंसान में ईश्वर नहीं दिखता बल्कि पत्थर का दिखाई देता। विनीत पाठक जब विद्यालय में भी पढ़ने नहीं आया तो मैं उसके कमरे में गया (विद्यालय नीचे विशाल भवन में चलता और बच्चों का आवास ऊपर बने कमरों में था)। प्राचार्य उस दिन अवकाश पर थे। मैंने यथासंभव विनीत को दवाई दी (क्योंकि मैं चिकित्सा प्रतिनिधि रह चुका हूँ) और अपने घर से उसके लिए मूँग की दाल की खिचड़ी बनवाकर लाया तथा उसे स्वास्थ्य लाभ करने का निर्देश दिया। दो दिन में वह पूरी तरह से ठीक हो गया। उस दिन से उसे मेरे प्रति कुछ विशेष लगाव हो गया। लेकिन दवाई की एक शीशी और कुछ टेबलेट कम होने का कारण प्राचार्य (जो कि प्रबंधक का गुलाम था) ने बच्चों से पता किया तो विनीत की पिटाई हुई और मुझ पर दवाइयाँ चुराने का आरोप आया। बात प्रबंधक तक भी पहुँची लेकिन प्रबंधक ने मेरे पक्ष में सकारात्मक टिप्पणी दी क्योंकि न जाने क्यों प्रबंधक आजतक मुझसे गलत नहीं बोला।
एक बात बताना चाहता हूँ कि वह बिना माँ-बाप का बच्चा था। अपनी मामा के घर रहकर पढ़ रहा था और मामा ने भी अपना पीछा उससे छुड़ाने के लिए उसे संस्कृत विद्यालय में भर्ती करवा दिया। आज भी विनीत जब बरेली आता है तो मुझसे मिले बिना नहीं जाता।
शेष अगले रविवार.....