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संस्मरण माला....4
मित्रों,
उस विद्यालय के प्राचार्य के बारे में बताता हूँ। वहाँ के प्राचार्य ने मेरा
साक्षात्कार लिया और मेरी शैक्षिक व शिक्षणेतर योग्यताओं से प्रभावित होकर मुझे
नियुक्त कर लिया। मैं भी पूरे मनोयोग से अपनी नौकरी करने लगा। प्रातःकाल मंदिर में
पूजा-वंदना करता तदुपरान्त विद्यालय में अध्यापन कार्य। वहाँ मेरा मन लग रहा था
क्योंकि शिव मेरे आराध्य हैं और शिवाराधना
मुझे प्रिय है। इस प्रकार मैं सदाशिव के चरणों में था और अपना प्रिय कार्य अध्यापन
भी कर रहा था।
कुछ
समय व्यतीत होने के साथ-साथ मैं विद्यार्थियों का प्रिय आचार्य बन गया। विद्यार्थी
खाली समय में मेरे पास आ बैठते और मुझसे ज्योतिष, संगीत एवं नैतिक ज्ञान ग्रहण
करते। कुछ छात्र अपनी व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान भी मेरे पास आकर खोजते। मुझे
तनिक भी भान नहीं था कि छात्रों का मेरे प्रति इतना लगाव स्वयं मेरे लिए कष्टसाध्य
हो जाएगा। इसका पता तब लगा जब प्राचार्य ने मेरी योग्यताओं को दरकिनार करके मुझमें
बुराइयाँ ढूँढ़ना आरंभ कर दिया। उन्हें मुझसे न जाने किस बात की चिढ़ थी। वह मेरे
अच्छे-अच्छे (सिल्क के) कुर्ते, धोतियों, चूड़ीदार पायजामे आदि से युक्त वेशभूषा
से चिढ़ने लगे। एक बार प्रबंधक महोदय के आदेशानुसार मैंने प्रत्येक शनिवार सुन्दरकाण्ड
का पाठ एवं उस पर प्रवचन आरंभ किया। कुछ शनिवार यह चला भी लेकिन बीच में प्राचार्य
महोदय ने स्वयं श्रीमद्भागवतपुराण पर प्रवचन करने का संकल्प लेकर अपना अनुष्ठान
आरंभ कर दिया और मेरी कथा बीच में ही छूट गयी। मैं स्कूटर से विद्यालय जाता और वे
स्वयं साइकिल से आते थे। संभवतः इसी चिढ़न के कारण उन्होंने मुझसे प्रतिस्पर्धा
करनी शुरू कर दी। मेरी ही भाँति पीएच.डी. करने के लिए यहाँ-वहाँ विश्वविद्यालयों
में आवेदन आरंभ कर दिये। मेरा मोबाइल फोन देखकर 4 दिनों के अन्दर अपने लिए भी एक
मोबाइल फोन ले लिया। वस्तुतः उनके अन्दर हीन भावना थी जिसके कारण वह मेरी बराबरी
करना चाहते थे। लेकिन उनके लिए यह अच्छा हुआ क्योंकि उन्होंने पीएच. डी. की और उत्तराँचल
में अध्यापक के लिए नियुक्त हो गये। वर्तमान में वह राजकीय इंटर कालेज, पिथौरागढ़
में सरकारी नौकरी कर रहे हैं। मज़ेदार बात यह है कि जब उन्हें पता चला कि मैं लेखक
बनना चाहता हूँ और काव्य रचना आदि करता हूँ तो उन्होंने भी काव्य रचना आरंभ कर दी
और मेरे उपनाम ‘पवन’ की भाँति उसने अपना उपनाम ‘प्रती…’
रख लिया। पूरा नाम नहीं बताऊँगा क्योंकि फेसबुक पर नाम
सार्वजनिक न करने का संकल्प लिया है। हाँ,
मेरी पुस्तक में सबके असली नाम ही मिलेंगे।
खैर,
जो हुआ अच्छा हुआ। कम से कम उन प्राचार्य महोदय का जीवन सँवर गया और वे एक
सम्मानित पद पर आसीन हुए। ईश्वर उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करे।
आज
के लिए इतना ही अगले रविवार मैं आपको बताऊँगा कि किस प्रकार मैं संस्कृत विद्यालय
से सी.बी.एस.ई. विद्यालय में नियुक्त हुआ और कैसे मेरी नौकरी आगे बढ़ती गयी। साथ
ही अब मैं अपने प्रेम-संबंधों के विषय में बताना भी आरंभ करूँगा जिसके लिए मेरे कई
प्रशंसक प्रतीक्षा कर रहे हैं और मुझे फोन से निरन्तर सम्पर्क कर रहे हैं।