Friday, February 26, 2010
कई बार अनुभव किया है की बहुत कुछ करने के बाद भी ek उद्वेलन मन के किसी कोने में निरंतर बना रहता है। कोई कविता लिखता हूँ या फिर कोई कहानी, कि शायद इस पीढ़ा का कोई तो उपचार मिले। लिखने के बाद कुछ सीमा तक शांति भी मिलती है लेकिन स्थाई रूप से नहीं। क्योंकि मेरी रचना लोगो तक कैसे पहुचे. इसलिए एक स्वयम की पत्रिका 'साहित्यायन' आरम्भ की। अपनी उसी पीढ़ा को अभिव्यक्त करने के लिए अब यह मार्ग चुना है, जिसे मैंने नाम दिया है, "अभिव्यक्ति मन की।" आशा है मन की बात अब बहुत दूर तक पंहुचा पाऊंगा. मन की बात कहने का एक अच्छा माध्यम मिल गया है।
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